ईस्लाम में तलाक़ देने का इख़्तियार औरतों को  नहीं








ईस्लाम में तलाक़ देने का इख़्तियार औरतों को  नहीं

⭕आज का सवाल नंबर -३२९६⭕

इस्लाम में तलाक देनेका ईखतयार सिर्फ मर्दो को है,  औरतो को कयुं नही़ं ?

🔵 जवाब 🔵

حامدا و مصلیا مسلما

१. मर्द को  औरत पर अल्लाह त’आलाने एक क़िस्मकी बरोतरी दी हे ।  क्योंकि के शादी के बाद औरत का महर, वलिमे का खर्च, ओर बीवी बच्चौके खाने-पीने, कपडे व मकान वग़ैरह का खर्च, इस्लाममें मर्द के जिम्मे रख्खा है। अगरचे औरत मालदार हो ओर कमाती हो,  ओर अपना खर्च खुदभी ऊठानेके काबील हो तो भी खर्च की जिम्मेदारी मर्द से माफ नही होती है ।ओर अक्सर  औरतौं के मुकाबले मे  इन्तेजामी सलाहियत, अक़ल समझदारी, गुस्से पर कंट्रोल ?  कुव्वते बर्दास्त, रंज व गम से जल्दी मुताससीर न होना,  ये तमाम सिफ़त अक्सर मर्दो  में ज्यादा होती हैं ।  लिहाज़ा अक्सर मर्द तलाक अक्सर औरतों के मुकाबले में सोच समझ कर देगा, कयों की उसे मालूम है के तलाक के बाद भी बीवी का ईद़त तक का  खर्च और बच्चों का बालिग व शादी होने तक का खर्च और बीवीको परवरिश और देखभाल का खर्च, दुसरी शादी के महर वलीमे का खर्च,  मदँ के जिम्मे है । ऐसा कोई खर्च औरत के जिम्मे नही है । लिहाज़ा ये सब खर्च ऊसके जिम्मे तलाकके बाद दोबारा  आईगे, इसलिये मर्द सोच समझ कर तलाक देगा ।

औरत के जिम्मे दुसरी शादी के बाद भी किसी किस्म का खर्च उसके जिम्मे नही आयेगा ।   बल्कि दूसरी शादी की वजह से  महर और कपडे वग़ैरह  दूसरे शोहर से मिलेगा।  लिहाज़ा वह तलाक देनेकी ज्यादा जरुरत करेगी ।  और अक्सर औरतें जल्दबाज, जजबाती, रंज व गम  से जल्दी मुतासीर होने वाली, कम समझ होती हैं अगर तलाक का ईख्तियार उसे दीया जावे तो जितनी तलाक मर्द वाकया करता है उससे दुगनी औरतैं वाकया करती ।
मर्द तलाक देने का ईखतयार  औरतको भी दे सकता है,  जिसे तफवीज़  कहते हैं । जब मर्द औरत को तलाक देने का ईख्तियार देगा तो औरतभी अपने आप पर तलाक वाकया कर सकती हैं । एक दौर अरब में ऐसाभी  गूजरा है कि औरत शादी होते ही तफवीज़ के जरीये तलाक का ईख्तियार शौहरसे अपने नाम पर लीखवा लिया करती थी । उस जमानेमे औरतैं मामुली झगड़े में भी तलाक अपने आप को देने के वाकियात बहुत ज्यादा हुए थे । लिहाज़ा तजुर्बा व अकल इस बात को मान लेती है कि असल तलाक  देने का ईखतयार  मर्दो को ही होना चाहिए ।
नोट:-
हर सो (100) मे से एक दो औरतें ऐसी भी होती हैं जो  मर्दो से ज्यादा अक्लमंद,  गुस्से पर काबू रखने वाली वगैरह शिफ़त में मर्दो से आगे होती है,  और बाज़ मर्द औरतौंसे ज्यादा नासमझ, जल्दबाज वग़ैरह कमजोरी रखनेवाला होते हैं । लिहाज़ा शरीयतके हुक्मका दारोमदार अक्सर लोगौं के ऐतबार से होता है,  बाज़ लोगोके ऐतबारसे नहीं होता ।

📕तनाजउत का शरई हाल और शौहर को हक़ ए तलाक कयुं?  सफा 21 से 23 का खुलासा ।

و الله اعلم بالصواب

✍🏻मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया।